कूक रही अमराही कोयलिया,
देख टिकोरे लटक रहे,
धीरे-धीरे फूल रहे संग,
धीरे-धीरे मटक रहे।
पूंछ उठा कर फुदके कोयलिया,
सखी-सहेली बुला रही,
प्रात पवित्र ध्वनि ऊपर प्रतिध्वनि
कारण घण्टी झुला रही।
आंवला पूजन प्रातः भ्रमणम्, पंच तत्त्व की प्राप्ति करारी, पौष्टाहार प्रसन्न चित्त-मन, धर्म-कर्म का ध्यान पुरारी। समय देश प्यारा मनुहारी, ...